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सरकारी स्कूल में साथ पढ़ाते थे चार शिक्षक, चारों बने विधायक

भिलाई. यह बात सुनने में जरूर अविश्वसनीय लगे, लेकिन सौ फीसदी सच है कि अविभाजित दुर्ग जिले में एक ऐसा स्कूल है, जहां साथ-साथ बच्चों को पढ़ाने वाले 4 शिक्षक कालांतर में बारी-बारी से विधायक चुने गए। इनमें एक को अभी केबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त है, तो एक वर्तमान में विधायक हैं। शिक्षक से विधायक बने देवलाल दुग्गा, स्व. लोकेन्द्र यादव, विनोद खांडेकर व सांवला राम डाहरे कभी साथ-साथ दल्लीराजहरा के बीएसपी सीनियर सेकंडरी स्कूल नंबर-2 में शिक्षक हुआ करते थे। 
 
एक समय सुदूर आदिवासी अंचल में शिक्षा के प्रमुख केन्द्र के रूप में दल्लीराजहरा के बीएसपी सीनियर सेकंडरी स्कूल की अपनी अलग पहचान थी। इस स्कूल में पढ़े बच्चे जीवन में किस मुकाम पर पहुंच पाए और किस क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहे हैं? यह अलग सवाल है, लेकिन इस स्कूल से जुड़ा एक रोचक संयोग यह है कि अपने परिवार के गुजारे व बच्चों के भविष्य गढ़ने की जिम्मेदारी निभाने शिक्षकीय पेशे को चुनकर यहां अपनी सेवाएं देने वाले 4 शिक्षक बाद में बारी-बारी से विधायक चुने गए। 
 
यह जानकर आश्चर्य होगा कि बस्तर में बलीराम कश्यप के बाद सबसे कद्दावर आदिवासी नेता माने जाने वाले देवलाल दुग्गा इस स्कूल में शिक्षक थे। सबसे पहले 1993 में वे भानुप्रतापपुर से विधायक चुनकर सक्रिय राजनीति में आ गए। इसके बाद सन् 1998 व 2008 में भी विधायक बने।
 
वर्तमान में वे छत्तीसगढ़ अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष हैं और उन्हें केबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त है। इसी स्कूल में शिक्षक रहे लोकेन्द्र यादव सन् 1998 में भाजपा की टिकट पर विधायक चुने गए। बाद में वे कांग्रेस में शामिल हो गए थे। र्शी यादव का निधन हो गया है, लेकिन वे विधायक रहते भी और ताउम्र गुरूजी के नाम से ही जाने-पहचाने जाते थे। यहीं व्यायाम शिक्षक रहे विनोद खांडेकर सन् 2003 में डोगरगढ़ से विधायक बने। 
 
श्री खांडेकर ने सन 81 से 89 तक दल्ली राजहरा में अपनी सेवाएं दी। इसके बाद उनका स्थानांतरण भिलाई हो गया, लेकिन उनकी कर्मभूमि डोगरगढ़ बनी रही। वाणिज्य कर अधिकारी से अहिवारा के विधायक बने सांवला राम डाहरे के संबंध में कम लोगों को ही पता है कि वे सन 85 से पहले दल्ली राजहरा के ही सीनियर सेकंडरी स्कूल में शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। 
 

वर्तमान में विधायक के साथ उन्हें भिलाई जिला भाजपा अध्यक्ष भी बनाया गया है। बकौल र्शी खांडेकर व र्शी डाहरे आज भी एक-दूसरे के संपर्क में रहते हैं और पुराने दिनों को याद भी करते हैं।
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