आदिवासी छात्रों के लिए राज्य के स्तर पर कई तरह के प्रयास किए जा रहे हैं,
लेकिन केंद्रीय मद से चलने वाले एकलव्य विद्यालय उपेक्षा के शिकार हो रहे
हैं। प्रदेश में 25 एकलव्य विद्यालय हैं, पिछले कई सालों से चल रहे इन
विद्यालयों को न तो आज तक स्थाई शिक्षक मिले और न ही स्टॉफ।
जैसे-तैसे इन
विद्यालयों को चलाकर सरकारी योजना की खानापूर्ति की जा रही है। प्रदेश के 9
जिलों में इन विद्यालयों को खोलने की घोषणा कर एडमिशन भी ले लिया गया,
लेकिन ने शिक्षकों व स्टॉफ के सेटअप के पद स्वीकृत हुए न ही इनके लिए भवन
बने। जिस जिले में भवन बनाया गया, उसमें मेडिकल कॉलेज चलाया जा रहा है।
राजनांदगांव में 2011 में विद्यालय शुरू हुआ, लेकिन यह अभी भी किराए के
भवन में संचालित हो रहा है। इसी तरह प्रदेश के 9 नए एकलव्य विद्यालय भी
सरकारी और गैर सरकारी भवनों में चल रहे हैं। अकेले राजनांदगांव में 4 लाख
96 हजार 1 सौ रुपए हर महीने किराए पर खर्च हो रहा है। राजनांदगांव में
विद्यालय के लिए भवन भी बना है। लेकिन इनकी बिल्डिंग में शासकीय मेडिकल
कॉलेज चल रहा है। 2011 से 2014 तक यह राजनांदगांव के अनुसूचित जाति बालक
आश्रम पनेका में संचालित होता रहा। जब बिल्डिंग बनकर तैयार हो गई लेकिन
शिफ्टिंग का समय आया तो इसे यहां विद्यालय लगाने की जगह किराए के भवन में
शिफ्ट कर दिया गया। अक्टूबर 2014 से अब तक यह विद्यालय किराए के भवन में ही
चल रहा है। मार्च 2018 तक अकेले इस विद्यालय के लिए लगभग 1 करोड़ 92 लाख 12
हजार 600 रुपए का भुगतान किया जा चुका है। हालांकि, विभागीय अफसरों को
कहना है कि इसके लिए चिकित्सा विभाग ने बकायदा एमओयू किया है।
एकलव्य विद्यालय चलाने हर साल करोड़ों रुपए दे रहे भवन का किराया
84 फीसदी पद अब भी पड़े हैं खाली
प्रदेश के एकलव्य विद्यालयों में 84 फीसदी पद खाली हैं। इसमें
शिक्षकों के साथ ही गैर शैक्षणिक पद भी शामिल हैं। 25 एकलव्य विद्यालयों के
लिए शिक्षक के 600 पद हैं, इनमें से 493 पद रिक्त हैं। जबकि गैर शैक्षणिक
550 पदों में से 471 पद रिक्त हैं। इस तरह इन विद्यालयों के कुल सेटअप के
1150 पदों में से 964 पद रिक्त हैं। 2017-18 में जिन 9 जिलों गरियाबंद,
धमतरी, बलरामपुर, सुकमा, बालोद, बलौदा बाजार, महासमुंद, मुंगेली और जांजगीर
चांपा में नए एकलव्य विद्यालय खोले गए। इन विद्यालयों के लिए अभी तक सेट
अप स्वीकृत नहीं हुआ है, ऐसे में भर्ती का सवाल ही नहीं उठता। हालांकि,
विभाग का दावा है कि इन विद्यालयों में स्थानीय स्तर पर शिक्षकों की
व्यवस्था की गई है और 6082 छात्र-छात्राएं इन विद्यालयों में पढ़ाई कर रही
हैं। विभागीय अफसरों का कहना है कि इन पदों पर भर्ती की प्रक्रिया चल रही
है, लेकिन पिछले कई सालों से चल रही यह प्रक्रिया आज तक पूरी नहीं हो सकी
है।
उपयोगिता प्रमाणपत्र भी भेजा
एकलव्य विद्यालय के लिए हर साल करोड़ों रुपए का बजट केंद्र सरकार
से राज्य सरकार को भेजा जाता है। एक एकलव्य विद्यालय के लिए ही लगभग 80 लाख
रुपए का बजट होता है। इन पैसों से ही बच्चों के खाना, कपड़ा, शिक्षक और
अन्य स्टॉफ के वेतन आदि की व्यवस्था की जाती है। साथ ही एकलव्य विद्यालय
खोले जाने के पांच साल के अंदर ही इनके लिए भवन भी तैयार करना होता है और
भवन के उपयोग की उपयोगिता प्रमाण पत्र भी भेजना होता है, जिसमें यह बताना
होता है कि भवन में विद्यालय सुचारू रूप से चल रहा है। राजनांदगांव में
एकलव्य विद्यालय का भवन भी तैयार हो गया और विभाग की तरफ से केंद्र को
उपयोगिता प्रमाणपत्र भी भेज दिया गया, लेकिन विद्यालय को अपना भवन नहीं
मिला।
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