रायपुर। छत्तीसगढ़ विधानसभा के शीतकालीन सत्र 2025 के दौरान शिक्षा विभाग को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। सदन में यह आरोप लगा है कि शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने मंत्री को गलत और भ्रामक जानकारी देकर जवाब दिलवाया, जिससे विधानसभा की कार्यवाही और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
यह मामला सामने आते ही सियासी हलकों से लेकर शिक्षा जगत तक हलचल मच गई है।
सदन में कैसे उजागर हुआ मामला?
विधानसभा में जब शिक्षा से जुड़े अहम सवाल पूछे गए, तो मंत्री द्वारा दिए गए जवाबों में
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आंकड़ों की विसंगति
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मैदानी हकीकत से उलट जानकारी
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नीतिगत तथ्यों की कमी
स्पष्ट नजर आई। विपक्ष ने तुरंत आपत्ति जताते हुए कहा कि मंत्री को जो जानकारी दी गई, वह विभागीय अधिकारियों द्वारा तैयार की गई गलत रिपोर्ट पर आधारित थी।
विपक्ष का आरोप: यह केवल गलती नहीं
विपक्षी विधायकों ने कहा कि यह कोई सामान्य प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि
“सदन को गुमराह करने की गंभीर कोशिश”
है। उनका आरोप है कि शिक्षा विभाग के कुछ अधिकारी जानबूझकर अधूरी या गलत जानकारी दे रहे हैं, ताकि वास्तविक समस्याएं उजागर न हों।
शिक्षा जैसे संवेदनशील विभाग में लापरवाही!
शिक्षा विभाग से जुड़े फैसले सीधे
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छात्रों
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शिक्षकों
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अभिभावकों
और राज्य की भविष्य की पीढ़ी को प्रभावित करते हैं।
ऐसे में विधानसभा में गलत जानकारी जाना
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लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करता है
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नीतिगत निर्णयों पर गलत असर डालता है
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जनता के भरोसे को ठेस पहुंचाता है
सरकार का पक्ष क्या है?
सत्तापक्ष की ओर से कहा गया कि
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मामला संज्ञान में लिया गया है
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संबंधित अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगा जाएगा
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यदि गलती पाई गई तो कार्रवाई की जाएगी
सरकार ने यह भी कहा कि भविष्य में सदन में दी जाने वाली जानकारी की दोहरी जांच व्यवस्था पर विचार किया जा रहा है।
पहले भी उठ चुके हैं सवाल
यह पहली बार नहीं है जब शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे हों। पिछले सत्रों में भी
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योजनाओं की प्रगति
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शिक्षकों की नियुक्ति
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शैक्षणिक गुणवत्ता
को लेकर आंकड़ों और वास्तविक स्थिति में अंतर देखने को मिला है।
विशेषज्ञों की राय
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि
“अगर नीति-निर्माण गलत जानकारी पर आधारित होगा, तो सुधार की कोई भी योजना सफल नहीं हो सकती।”
उन्होंने शिक्षा विभाग में
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डेटा की पारदर्शिता
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जवाबदेही
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और ग्राउंड रिपोर्टिंग सिस्टम
को मजबूत करने की जरूरत बताई है।